Thursday, October 11, 2007

अनोखी परी...

घनी जुल्फों के साए में, एक कमसीन कली कल देखी थी।
हल्की सी गुलाबी काया थी, और आँखों में जीवन रेखा थी।

जबीं की चमक, रुखसार अदा, तरसते से लबों का मीठा नशा,
सच कहूँगा तो झूठ लगेगा, वो परी सचमुच अनोखी थी।

क्या खूब थी उसकी जवानी की बू, सब दौडे दौडे आते थे,
सब कुछ था कदमो में फिर भी, वो लगती कुछ भूखी थी।

है काफी करने को बयां, काश उनकी इजाजत मिल जाती,
अकेले नहीं हम आशिक उनके, कईयों ने गज़लें लिखी थी।

निशान्त Nishant

जबीन : Forehead, रुखसार : Face.

3 comments:

Anonymous said...

परियों की खूबसूरती तो तुम्हारी ग़ज़ल ही बयान कर सकती है, हमने तो सिर्फ सुना है, तुमने तो देखा भी है.

Anonymous said...

Very touching words striaght from heart... Keep it up!!! wish to see more of your thoughts online... Thanks for posting comment for my poem---- Shilviya

loving soul said...

sanjukta ke blog se hokar main yahan pahunchi...
vistar se padhane ke liye aapke blog me bahut kuch paya... asha hai yahan par fir ana hoga... aap bhi humare yaha aaiye... main hindi aur angareji dono me kuch kuch kabhi kabhi likhati hun ...